हनी अभी अपने ख्यालों
में ही है कि अचानक दरवाज़े पर खटखटाहट होती है और वो वापस होश में आता है।
श्रेया, नूर और शिफाली घर में घुसती हैं। रात के नौ बज चुके हैं। हनी को खाना खाए
हुए 36 घण्टे से भी ज्यादा हो गए हैं। उसमे बिल्कुल भी जान नहीं बची है। उसका
चेहरा देखकर किसी को भी इस बात का एहसास हो सकता है कि मानो वो कई दिनों से बीमार हो।
वो थका हुआ सा है।
हनी उन तीनों से पूछटा
है- “तुम लोग
मुझे अकेला छोड़कर कहां चले गए थे? यहां कुछ भी नहीं है खाने
के लिए। किचन भी खाली है। और मेरा मोबाइल कहां है।”
श्रेया पहले मुस्कुराती
है और फिर कहती है- “अरे
बेबी हम खआना लेने ही गए थे। लो पहले कुछ खा लो फिर इन सवालों के जवाब भी मिल
जाएंगे।”
हनी- “नहीं मुझे कुछ नहीं खाना। मपझे बस एब
घर जाना है।”
नूर- “चले जाना। चले जाना। एक बार हमारे साथ
कूचीकू तो कर लो.. फिर आराम से चले जाना।”
हनी- “मैं थक गया हूं। मेरी हालत बहुत खराब
है तुम समझती क्यूं नहीं। अब मुझे बिल्कुल जान नहीं बची है। मैं अब सेक्स नहीं कर
सकता। प्लीज़ मुझे जाने दो।”
शिफाली- “अरे तुम्हारी जान के होते
तुम्हारी जान कैसे चली जाएगी। देखो मैं तुम्हारी जान लेके आई हूं।”
शिफाली एक स्प्रे हनी
की तरफ फेंकती है जो कि नीचे गिर जाता है।
नूर हनी के बगल में बैठ
जाती है और उसे एक्साइट करने के लिए उसके बालों में अपनी उंगलियां फेरती है। कभी
यहां तो कभी वहां किस करती है। मगर हनी को ये बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा। उसे इस
सबसे सिर्फ दर्द हो रहा है। मानो हनी का बलात्कार किया जा रहा हो। वो
लड़कियां जबरदस्ती हनी एक्साइट करने के लिए कभी स्प्रे का इस्तेमाल कर रहीं हैं तो
कभी उसे किस कर रही हैं।
हनी की आंखों से आंसू
बहे जा रहे हैं। उसमें तो इतनी भी हिम्मत नहीं की वो चिल्ला भी सके। आखिरकार उसकी
आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है और वो ज़मीन पर गिर जाता है।
सूरज की कड़ी धूप ने सबकुछ
जला देने की मन मे ठानी हो जैसे। एक कुत्ता पेशाब कर रहा है। और वो पेशाब कर किस
पर रहा है? हनी
पर। दरअसल हनी सड़क के किनारे एक पेड़ के पास कूड़ेदान के सहारे लेटा हुआ है।
आते-जाते लोग उसे शराबी समझ रहे हैं तो कुछ उसे पागल समझ रहे हैं। कपड़े के नाम पर
उसने बस एक इनर पहनी हुई है। वो उठने की कोशिश करता है मगर फिर गिर सा जाता है।
फिर पूरी जान लगाकर उठता भी है तो लड़खड़ाते हुए सा उठता है। और अपना रास्ता
तलाशता है और चल देता है। गुमसुम... जैसे उसकी इज्ज़त लूट ली गई हो।
मेरी
राहें, मेरी मंज़िलें...
जो कुछ भी थी मेरी आरज़ुएं...
ना जाने क्या हो गए...
कहां खो गए...
मेरी सिसकियां, मेरी आहें...
जो कुछ भी थी मेरी आरज़ुएं...
ना जाने क्या हो गए...
कहां खो गए...
मेरी सिसकियां, मेरी आहें...
दबी
हुई सी मेरी कराहें...
मुझे तोड़ने लगे हैं...
मेरे अपने भई अब मुझे...
छोड़ने लगे हैं...
मेरे सारे अरमां सो गए...
मेरी राहें, मेरी मंज़िलें...
जो कुछ भी थी मेरी आरज़ुएं...
ना जाने क्या हो गए...
कहां खो गए...
मुझे तोड़ने लगे हैं...
मेरे अपने भई अब मुझे...
छोड़ने लगे हैं...
मेरे सारे अरमां सो गए...
मेरी राहें, मेरी मंज़िलें...
जो कुछ भी थी मेरी आरज़ुएं...
ना जाने क्या हो गए...
कहां खो गए...
यो
एहसास है या मेरी रूह की आवाज़ है...
मेरी ज़िंदगी भी एक बेजान कोई साज़ है...
आंसुओं से पाला ना पड़ा ज़िंदगी भर...
आज इस कदर टूटे की हाल क्या पूछा और हम रो गए...
मेरी राहें, मेरी मंज़िलें...
जो कुछ भी थी मेरी आरज़ुएं...
ना जाने क्या हो गए...
कहां खो गए...
मेरी ज़िंदगी भी एक बेजान कोई साज़ है...
आंसुओं से पाला ना पड़ा ज़िंदगी भर...
आज इस कदर टूटे की हाल क्या पूछा और हम रो गए...
मेरी राहें, मेरी मंज़िलें...
जो कुछ भी थी मेरी आरज़ुएं...
ना जाने क्या हो गए...
कहां खो गए...
हनी रास्ते पर चला जा
रहा है। बिल्कुल गुमसुम सा। उसके आस-पास लड़कियां गुज़र रही हैं मगर वो नज़रें
झुकाए आगे बढ़ा चला जा रहा है। वो न रास्तों से गुजरता है जहां दोस्तो के साथ बैठकर
वो अक्सर लड़कियों को छेड़ा करता था। हनी को कुछ होश नहीं है। वो चुपचाप चलता जा
रहा है। और दूर कहीं जाकर आंखों से ओझल हो जाता है।
"हॉस्पिटल के बेड पर
लेटे हुए मेरे हाथों में एक किताब और एक पैन है। इसी के ज़रिए मैं ये कहानी आपको
बता रहा हूं। आप शायद सोच रहे होंगे मुझे इस सबके बारे में कैसे पता? दरअसल मैं ही हूं हनी।
जी हां! ये मेरी कहानी है। मैने ज़िंदगी भर
औरत को सेक्स का एक ज़रिया ही समझा। शआयद भूल गया था अपनी मां, अपनी बहन के बारे
में। एक खिलौना जिससे खेलने का हक हर मर्द को पैदाइशी होता है। मुझे इस बात का ज़रा
सा भी अंदाज़ा नहीं थी कि मेरी ये नासमझी ही मेरी सज़ा बन जाएगी। कोमल के साथ मैने
गलत किया। शायद गलत बोलकर मैं अपने गुनाह को कम करके बता रहा हूं। हमने कोमल का
बलात्कार किया और उसने फांसी लगा ली। बलात्कार तो मेरा भी हुआ और वो शायद सज़ा थई
मेरे गुनाहों की। मैं आज तिल-तिल कर मरने के लिए मजबूर हूं। हां, उन तीनों
लड़कियों को एड्स था और अब उनसे ये बीमारी मुझे हो गई है। अपनी आखिरी सांसे लेने
से पहले मैं अपनी कहानी अपनी ख़लिश आप सभी के साथ बांटना चाहता था। ताकी आप भी औरत को सिर्फ सेक्स
या भोग के ले इस्तेमाल की जाने वाली जिस्मानी चीज़ ना समझे। कहते हैं ऊपर वाले की लाठी में आवाज़
नहीं होती। जो कुछ इस दुनिया मे आप करते हैं उसका फल भी आपको यहीं पर भुगतना होता
है। और अगर आप ऊपरवाले में विश्वास नहीं रखते तो आपसे मैं बस इतना कहना चाहुंगा कि Every Action Has An Equal And Opposite Reaction. जैसा आप
करोगे आपको वैसा ही भुगतना भी पड़ेगा। जहां तक मेरी बात है तो मैं तो बस अब
दिन-रात मौत की दुआएं ही मांग रहा हूं। ऊपर जाकर कोमल से माफी मांगूंगा तभी शायद
मेरा दर्द कुछ कम हो पाए।
“आज अपने सारे गुनाहों के धब्बे
धोने दे,
मैं
क्या था.. मैं क्या हूं.. मुझए कुछ याद नहीं,
मेरी
तरह तू भी खुद में मुझको खोने दे,
आज
मेरे दर्द की इंतेहां ना पूछ,
बस
सिर कांधे पे रखकर रोने दे,
बहुत
दिन हो गए सुकूं भरी नींद नहीं आई,
मुझे
अपनी आगोश मे ले ले और सोने दे”
“खलिश”
By
Krish
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